उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo KHwab mein hua tha waqai na ho

जो ख़्वाब में हुआ था वाक़ई न हो

جو خواب میں ہوا تھا واقعی نہ ہو

शायर: Naeem Gilani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो ख़्वाब में हुआ था वाक़ई न हो
कि मैं पुकारता रहूँ कोई न हो

चराग़ बे-सबब तो रो नहीं रहे
जो शब गुज़र रही है आख़िरी न हो

जिसे सुकूत-ए-मर्ग का निशाँ कहें
ये ख़ामुशी कहीं वो ख़ामुशी न हो

पड़ी हुई है गर्द सी जो वक़्त पर
ये चश्म-ए-ख़्वाब-ज़ाद से गिरी न हो

मुझे ये हुक्म भी सुना दिया गया
कि नाव में मिरे सिवा कोई न हो

यक़ीं भरी-बहार का भी कुछ नहीं
अगर ये शाख़-ए-दर्द ही हरी न हो

मिरा मोआ'मला 'नईम' और है
अगर तिरी नज़र में सरसरी न हो