उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yun bhi nahin ki sham-o-sahar intizar tha

यूँ भी नहीं कि शाम-ओ-सहर इंतिज़ार था

یوں بھی نہیں کہ شام و سحر انتظار تھا

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँ भी नहीं कि शाम-ओ-सहर इंतिज़ार था
कहते नहीं थे मुँह से मगर इंतिज़ार था

मुद्दत के बा'द फूल की सूरत खिला था दिल
शबनम की तरह ताज़ा-ओ-तर इंतिज़ार था

बालों में धूल पाँव में छाले न थे मगर
फिर भी कुछ एक रंज-ए-सफ़र इंतिज़ार था

कोई ख़बर थी उस की परिंदों के शोर में
रंग-ए-हवा में शाख़-ओ-शजर इंतिज़ार था

यूँ थी जवाहरात लब-ओ-चश्म की झलक
जैसे ये कोई लाल-ओ-गुहर इंतिज़ार था

दालान-ओ-दर में एक तवक़्क़ो थी मौज मौज
दीवार-ओ-बाम थे कि भँवर इंतिज़ार था

ऐसे में ए'तिबार किसी पर न था मुझे
मैं भी था साथ साथ जिधर इंतिज़ार था

आँखें थीं ख़ुश्क ख़ुश्क तो दिल भी था बंद बंद
खुल ही नहीं रहा था किधर इंतिज़ार था

मायूस होने वाले न थे हम भी ऐ 'ज़फ़र'
आया नहीं तो बार-ए-दिगर इंतिज़ार था