उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yun bhi nahin ki dil mein koi gham nahin raha

यूँ भी नहीं कि दिल में कोई ग़म नहीं रहा

یوں بھی نہیں کہ دل میں کوئی غم نہیں رہا

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँ भी नहीं कि दिल में कोई ग़म नहीं रहा
ये सिलसिला कुछ इतना मुनज़्ज़म नहीं रहा

दिल से तो ख़ैर धो गई बारिश तमाम नक़्श
दीवार-ए-शहर का भी वो आलम नहीं रहा

ज़िद पर वो अपनी आज भी क़ाएम तो है मगर
अगला सा वो बयान में दम-ख़म नहीं रहा

मायूस हो चुका है कि है मुतमइन ये दिल
वो ज़ख़्म भर गए हैं कि मरहम नहीं रहा

कश्ती-ए-दिल तो एक थपेड़े की मार थी
तूफ़ान-ए-नाज़ किस लिए अब थम नहीं रहा

छोड़ी है जब से हम ने 'ज़फ़र' आजिज़ी की ख़ू
इतना मिज़ाज उस का भी बरहम नहीं रहा