उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye sochta hun ki KHud aarif-e-hayat bhi hai

ये सोचता हूँ कि ख़ुद आरिफ़-ए-हयात भी है

یہ سوچتا ہوں کہ خود عارف حیات بھی ہے

शायर: Kaif Moradaabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये सोचता हूँ कि ख़ुद आरिफ़-ए-हयात भी है
बशर जो महरम-ए-असरार-ए-काएनात भी है

नफ़स नफ़स में रहे क्यों न इक जहान-ए-सिफ़ात
मिरी निगाह में तनवीर-ए-हुस्न-ए-ज़ात भी है

दिलों को मिल नहीं सकती थी इशरत-ए-अबदी
हज़ार शुक्र मोहब्बत में ग़म की रात भी है

वो इक ख़याल कि जिस ने ग़म-ए-हयात दिया
वही ख़याल इलाज-ए-ग़म-ए-हयात भी है

जो सिर्र-ए-इश्क़ भी है राज़-ए-हुस्न-ए-जानाँ भी
यक़ीं करो मिरे दिल में इक ऐसी बात भी है

ये हर गुनह पे जो एहसास है नदामत का
मुझे तो 'कैफ़' यही हीला-ए-नजात भी है