उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ahl-e-dil jo bhi baat kahte hain

अहल-ए-दिल जो भी बात कहते हैं

اہل دل جو بھی بات کہتے ہیں

शायर: Kaif Moradaabadi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अहल-ए-दिल जो भी बात कहते हैं
कोई राज़-ए-हयात कहते हैं

उन के ग़म से है जावेदाँ वर्ना
ज़ीस्त को बे-सबात कहते हैं

हाए वो दौर-ए-इश्क़ जब आँसू
दास्तान-ए-हयात कहते हैं

ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में जो गुज़रता है
हम तो उस दिन को रात कहते हैं

इश्क़ की इस्तिलाह में ग़म को
इंक़लाब-ए-हयात कहते हैं

जो भी हैं वाक़िफ़-ए-हक़ीक़त-ए-दिल
दिल को ही काएनात कहते हैं

लफ़्ज़-ओ-मा'नी में आ नहीं सकती
वो नज़र से जो बात कहते हैं

मर्द-ए-हक़ में तो मा-सिवा को भी
परतव-ए-हुस्न-ए-ज़ात कहते हैं

मुद्दतों ग़ौर करना पड़ता है
उन से जब दिल की बात कहते हैं

कार-गाह-ए-नुक़ूश-ए-इबरत को
'कैफ़' सब काएनात कहते हैं