उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baDhe chalo ki zamane ko ye dikhana hai

बढ़े चलो कि ज़माने को ये दिखाना है

بڑھے چلو کہ زمانے کو یہ دکھانا ہے

शायर: Kaif Moradaabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बढ़े चलो कि ज़माने को ये दिखाना है
जहाँ हमारे क़दम हैं वहीं ज़माना है

ये हुस्न-ओ-इश्क़ की तफ़रीक़ इक बहाना है
कहीं नज़र को कहीं दिल को आज़माना है

अब इस जुनून-ए-तलब का कोई ठिकाना है
कि अपने आप को खो कर भी उन को पाना है

बस एक इश्क़ ही ऐसा शराब-ख़ाना है
जहाँ सुरूर का मफ़्हूम होश आना है

इलाही तमकनत-ए-हुस्न-ओ-नाज़-ए-हुस्न की ख़ैर
कुछ आज इश्क़ का अंदाज़ वालिहाना है

मैं हर गुनाह की हक़ीक़त बता तो दूँ सर-ए-हश्र
मगर उन्हें जो हर इल्ज़ाम से बचाना है

ज़रा जुनून-ए-तमन्ना से दिल गुज़र जाए
फिर इस के बाद कोई दाम है न दाना है

मैं जानता हूँ जो है फ़र्क़-ए-ज़ात-ओ-परतव-ए-ज़ात
मिरी निगाह पस-ए-पर्दा-ए-ज़माना है

किसे नसीब हो सज्दा ये और बात है 'कैफ़'
हर इक जबीं के क़रीब उन का आस्ताना है