उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye sahra-e-mohabbat hai yahan saya nahin koi

ये सहरा-ए-मोहब्बत है यहाँ साया नहीं कोई

یہ صحرائے محبت ہے یہاں سایہ نہیں کوئی

शायर: Kaleem Jazil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये सहरा-ए-मोहब्बत है यहाँ साया नहीं कोई
गुज़रते जा रहे हैं सब मगर रुकता नहीं कोई

तुम्हीं से मेरी वाबस्ता बहार-ए-ज़िंदगानी थी
तुम्हारे बाद इन आँखों में अब जचता नहीं कोई

चलो चल कर नई दुनिया कोई आबाद करते हैं
कि मज़लूमों की फ़रियादें यहाँ सुनता नहीं कोई

मोहब्बत कब किसी को इस जहाँ में रास आई है
तुम्हारी बेवफ़ाई का मुझे शिकवा नहीं कोई

बयाबाँ की तरह लगती हैं जब ख़ामोश रहती हैं
छलक जाए तो इन आँखों सा फिर दरिया नहीं कोई

वतन पे जाँ-निसारी का तो दा'वा लोग करते हैं
किसी में जाँ लुटाने का मगर जज़्बा नहीं कोई

सभी आसूदा रहते हैं सुकूँ की नींद सोते हैं
हमारे शहर में 'जाज़िल' अभी भूका नहीं कोई