उर्दू शायरी · ग़ज़ल

abhi latafat-e-urdu zaban baqi hai

अभी लताफ़त-ए-उर्दू ज़बान बाक़ी है

ابھی لطافت اردو زبان باقی ہے

शायर: Kaleem Jazil6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अभी लताफ़त-ए-उर्दू ज़बान बाक़ी है
वो बाँकपन वो कलाम-ओ-बयान बाक़ी है

मोहब्बतों में जो रहती है फ़ासले की लकीर
अभी वो तेरे मिरे दरमियान बाक़ी है

निकल के देख तो बाज़ार-ए-ज़िंदगी में ज़रा
मोहब्बतों की हज़ारों दुकान बाक़ी है

तू देख ले तो तिरी आँख भी छलक उठ्ठे
बदन पे ज़ख़्म का सारा निशान बाक़ी है

मुझे हो ख़ौफ़ भला क्यों सियाह रातों का
तिरे ख़याल का रौशन जहान बाक़ी है

किताब-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत में आज भी 'जाज़िल'
विसाल-ओ-हिज्र की इक दास्तान बाक़ी है