उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye mai-parasti ye tang-dasti magar tumhein kya

ये मय-परस्ती ये तंग-दस्ती मगर तुम्हें क्या

یہ مے پرستی یہ تنگ دستی مگر تمہیں کیا

शायर: Parvez Muzaffar4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये मय-परस्ती ये तंग-दस्ती मगर तुम्हें क्या
घटाओं से आग है बरसती मगर तुम्हें क्या

नतीजा है सब हमारी बे-ए'तिदालियों का
चहार-जानिब ज़वाल-ओ-पस्ती मगर तुम्हें क्या

जिन्हें ज़रा भी शु'ऊर हासिल है जानते हैं
नहीं है ये वक़्त-ए-मौज-ओ-मस्ती मगर तुम्हें क्या

किसे बताएँ कि सब तुम्हारा किया धरा है
हयात महँगी है मौत सस्ती मगर तुम्हें क्या