उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo mere gunahon pe nazar rakhte hain

जो मेरे गुनाहों पे नज़र रखते हैं

جو میرے گناہوں پہ نظر رکھتے ہیں

शायर: Parvez Muzaffar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो मेरे गुनाहों पे नज़र रखते हैं
एल्बम में वही तितली के पर रखते हैं

ज़ुल्मत की समाअ'त में खुल पड़ता है
मज़लूम के अल्फ़ाज़ असर रखते हैं

किस वक़्त कहाँ कौन जलाता है चराग़
इतनी तो पतंगे भी ख़बर रखते हैं

हैं आबले काँटों के लिए पैरवी में
तारों के लिए दीदा-ए-तर रखते हैं

बातें वो भला कैसे करेंगे खुल कर
'परवेज़' मियाँ दिल में जो डर रखते हैं