उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye kis ne ahd-e-faramosh se sada di hai

ये किस ने अहद-ए-फ़रामोश से सदा दी है

یہ کس نے عہد فراموش سے صدا دی ہے

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये किस ने अहद-ए-फ़रामोश से सदा दी है
अभी चराग़ जलाए ही थे हवा दी है

ये विर्सा हम से नई नस्ल को कभी न मिले
ज़बाँ हमारे बुज़ुर्गों ने बे-नवा दी है

ख़िराज-ए-आरज़ू-ए-मौसम-ए-बहार है ये
लहू लहू जो मिरे पैरहन की वादी है

कोई भी घर से न निकले चराग़-ए-दिल ले कर
अमीर-ए-शहर की ये शहर में मुनादी है

मिली है ये मह-ओ-अंजुम से दोस्ती की सज़ा
कि आफ़्ताब ने बीनाई तक जला दी है

कहाँ से काटोगे कल तुम मसर्रतें 'आबिद'
ये फ़स्ल-ए-अश्क जो हर आँख में उगा दी है