उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhup ka bojh bhala maine uThaya kab tha

धूप का बोझ भला मैं ने उठाया कब था

دھوپ کا بوجھ بھلا میں نے اٹھایا کب تھا

शायर: Aabid Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धूप का बोझ भला मैं ने उठाया कब था
मैं तो तन्हा था मिरी ज़ात का साया कब था

इतने मानूस हुए ग़म से कि अब याद नहीं
वक़्त ने दर्द का अम्बार लगाया कब था

शाम उतरी मिरे चेहरे पे तो सोचा मैं ने
दिन मिरी ज़ीस्त के आँगन में समाया कब था

दर्द बढ़ता है तो ज़ख़्मों से मैं करता हूँ सवाल
संग मैं ने किसी वहशी पे उठाया कब था

अब भी है सुब्ह मिरी आँख में ज़ख़्मी ज़ख़्मी
कौन कहता है कि मैं शब का सताया कब था