उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ashk umDen to unhen palkon pe roka jae

अश्क उमडें तो उन्हें पलकों पे रोका जाए

اشک امڈیں تو انہیں پلکوں پہ روکا جائے

शायर: Aabid Jafri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अश्क उमडें तो उन्हें पलकों पे रोका जाए
क्यों ये पिंदार-ए-वफ़ा सूरत-ए-गिर्या जाए

जब से देखे हैं तिरी आँखों के सागर हम ने
इक नई आरज़ू उभरी है कि डूबा जाए

मैं समाअ'त में समेटे हूँ हज़ारों दुश्नाम
ज़ब्त-ए-ग़म का है ये इरशाद न बोला जाए

हम को इस ख़्वाब-ए-मोहब्बत से जगाया किस ने
नक़्श चेहरों पे अदावत का न देखा जाए

ज़ख़्म-ख़ुर्दा न कहीं उँगलियाँ वहशत हो जाएँ
बरबत-ए-दिल को किसी के न यूँ छेड़ा जाए

दिल है मस्लूब-ए-अना बाम पे सूरज भी नहीं
किस तरह घर के अँधेरों को उजाला जाए

पाँव जब ख़ार-ए-मुग़ीलाँ से हैं छलनी 'आबिद'
क्यों न फिर आतिश-ए-नमरूद में उतरा जाए