उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dard ki aanch mein jalta hai ye ghar kya kije

दर्द की आँच में जलता है ये घर क्या कीजे

درد کی آنچ میں جلتا ہے یہ گھر کیا کیجے

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर्द की आँच में जलता है ये घर क्या कीजे
ख़्वाब होती है तमन्ना की सहर क्या कीजे

हम भी मानूस नहीं दिल के अँधेरों से अभी
ताएर-ए-शब भी है खोले हुए पर क्या कीजे

दूर मंज़िल है कड़ी धूप में करना है सफ़र
कट गए राह में जितने थे शजर क्या कीजे

वो गए वक़्त की मानिंद न लौटेगा कभी
अब लुटा कर ये वफ़ाओं के गुहर क्या कीजे

बे-गवाही के भँवर में है मिरी ज़ात कि अब
आँख की झील भी होती नहीं तर क्या कीजे

बारिश-ए-संग तो बे-वज्ह नहीं है 'आबिद'
आ गया मुझ को वफ़ाओं का हुनर क्या कीजे