उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye kaenat ye bazm-e-zuhur kuchh bhi nahin

ये काएनात ये बज़्म-ए-ज़ुहूर कुछ भी नहीं

یہ کائنات یہ بزم ظہور کچھ بھی نہیں

शायर: Jalaluddin Akbar3 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये काएनात ये बज़्म-ए-ज़ुहूर कुछ भी नहीं
तिरी नज़र में नहीं है जो नूर कुछ भी नहीं

निगह अगर हो तो हर ज़र्रे में हज़ारों तूर
निगह अगर न हो बाला-ए-तूर कुछ भी नहीं

ये क़ुर्ब ओ बोद ब-मिक़दार-ए-शौक़ सालिक हैं
जिसे तू दूर समझता है दूर कुछ भी नहीं