उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo surahi jam ghaDe hain janab-e-man

ये जो सुराही जाम घड़े हैं जनाब-ए-मन

یہ جو صراحی جام گھڑے ہیں جناب من

शायर: Ikram Arfi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो सुराही जाम घड़े हैं जनाब-ए-मन
ख़ाली किसी सबब से पड़े हैं जनाब-ए-मन

वा'दों के जिस मक़ाम पे छोड़ा था आप ने
हम आज तक वहीं पे खड़े हैं जनाब-ए-मन

दौलत नहीं तो क्या है मिरी शा'इरी तो है
हर हर ग़ज़ल में मोती जुड़े हैं जनाब-ए-मन

ये जो मची है बाँस के जंगल में खलबली
हम जोगियों को साँप लड़े हैं जनाब-ए-मन

गिनवा रहे थे 'ऐब मिरे थोड़ी देर क़ब्ल
अब शर्म से ज़मीं में गड़े हैं जनाब-ए-मन

कज-बहसिए भी फ़हम-ओ-फ़रासत में कम नहीं
शा'इर भी आप जैसे बड़े हैं जनाब-ए-मन

राह-ए-जुनूँ में साथ मुक़द्दर ही दे तो दे
ये मरहले हनूज़ कड़े हैं जनाब-ए-मन

ऐसा नहीं कि फूल दरख़्तों ही से गिरे
कुछ शाख़-ए-चश्म से भी झड़े हैं जनाब-ए-मन

या तो मुशा'इरे को उठाता है ये फ़क़ीर
या वो कि जिन के बाल बड़े हैं जनाब-ए-मन

इकराम झूलते हैं मोहब्बत के पेड़ से
कुछ दिन से शाख़-ए-दिल पे अड़े हैं जनाब-ए-मन