उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bagh se muttasil hai ek gali

बाग़ से मुत्तसिल है एक गली

باغ سے متصل ہے ایک گلی

शायर: Ikram Arfi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाग़ से मुत्तसिल है एक गली
जहाँ खिलती है मेरे दिल की कली

महबस-ए-दिल में तुम नहीं आए
एक दिन तो यहाँ हवा भी चली

तेरी फ़ुर्क़त के दाग़ दिल में रखे
तेरे कूचे की ख़ाक मुँह पे मली

एक तू है कि है नज़र आता
एक मैं हूँ कि हूँ ख़फ़ी न जली

ज़र-ए-ख़ैरात फेंक देता हूँ
कौन चक्खे सख़ावतों की डली

सूखने वाले फिर हरे न हुए
राह की घास फिर न फूली-फली

पूछते हो कि कौन है 'इकराम'
कभी देखा है क्या जदीद 'वली'