उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo likkha hai mujhe ye jo miTaya hai mujhe

ये जो लिक्खा है मुझे ये जो मिटाया है मुझे

یہ جو لکھا ہے مجھے یہ جو مٹایا ہے مجھے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो लिक्खा है मुझे ये जो मिटाया है मुझे
न सही और तमाशा तो बनाया है मुझे

कोई तीर-ओ-तबर अपना भी निकाला होता
मेरे ही अस्लहा से उस ने डराया है मुझे

जैसे ये सब हैं इसी तरह का हो जाऊँ अगर
बैठे बैठे ये ख़याल आज ही आया है मुझे

'ऐब रखता हूँ कि आख़िर ये हुनर है मेरा
धूप मेरी है यही और यही साया है मुझे

ताकि मैं कुछ न कहूँ वज़' की मजबूरी में
इस लिए मसनद-ए-ऐवाँ पे बिठाया है मुझे

सर-ए-तस्लीम हूँ जिस तौर झुकाया मुझ को
दस्त-ए-ताईद हूँ जिस रंग उठाया है मुझे

मैं हूँ वो ख़ूँ कि बहाया है मुझे सड़कों पर
मैं हूँ वो रंग कि चेहरों से उड़ाया है मुझे

फ़ड़फ़ड़ाता हूँ अभी ज़ोर-ए-हवा में रुख़ पर
न उठाया है अभी और न गिराया है मुझे

मैं कि इस 'अह्द में मुनकिर हूँ 'ज़फ़र' अपना भी
किस लिए महफ़िल-ए-ग़ालिब में बुलाया है मुझे