उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye fikr chhoD ki kya kya fasana banta hai

ये फ़िक्र छोड़ कि क्या क्या फ़साना बनता है

یہ فکر چھوڑ کہ کیا کیا فسانہ بنتا ہے

शायर: Yash Trivedi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये फ़िक्र छोड़ कि क्या क्या फ़साना बनता है
तू मुस्कुरा कि तिरा मुस्कुराना बनता है

जमी हैं ओस की बूँदें जो बंद खिड़की पर
तो उँगलियों से वहाँ दिल बनाना बनता है

तुम एक शाम मिरे नाम कर ही सकती हो
वफ़ा का इतना तो अब मेहनताना बनता है

शराब छोड़ दी हम ने तुम्हारे कहने पर
तुम्हारा चाय पे अब तो बुलाना बनता है