उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek dard ko apna bana ke rakkha hai

हर एक दर्द को अपना बना के रक्खा है

ہر ایک درد کو اپنا بنا کے رکھا ہے

शायर: Yash Trivedi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर एक दर्द को अपना बना के रक्खा है
ये अपने आप को कैसा बना के रक्खा है

किसी ने हुस्न से आगे उसे नहीं देखा
सभी ने चाँद का टुकड़ा बना के रक्खा है

बड़े सुकून से वो सो रही है और उस ने
हमारे हाथ को तकिया बना के रक्खा है

मैं टूट जाऊँगा पत्थर न मारना मुझ को
तुम्हारे प्यार ने शीशा बना के रक्खा है

तुम्हारी ज़ुल्फ़ को हाथों से मैं सँवारूँगा
इसी ख़याल को सपना बना के रक्खा है