उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye faisla hai ki KHud se KHafa nahin rahna

ये फ़ैसला है कि ख़ुद से ख़फ़ा नहीं रहना

یہ فیصلہ ہے کہ خود سے خفا نہیں رہنا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये फ़ैसला है कि ख़ुद से ख़फ़ा नहीं रहना
वो मिल गया तो फिर उस से जुदा नहीं रहना

हँसी-ख़ुशी युँही दिन काटना हैं फ़ुर्क़त के
उदास फिरना नहीं मुब्तला नहीं रहना

वो रात रहने को आया था अपने घर से मगर
जो मैं ने पूछा तो कहने लगा नहीं रहना

ये कैफ़ियत है कि अब के ख़बर किसी को नहीं
कि क्या बहार में रहना है क्या नहीं रहना

वो कारोबार करेंगे ख़ुदा के नाम पे हम
कि इस नवाह में नाम-ए-ख़ुदा नहीं रहना

सियह-ज़बाँ हूँ मैं बच मेरी बद-दु'आ से कि तू
नहीं रहेगा अगर कह दिया नहीं रहना

उमीद-ए-वस्ल ग़लत भी नहीं कि उस बुत ने
'ज़फ़र' हमेशा तो यूँ बे-वफ़ा नहीं रहना