उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye dil jo paikar-e-sad-nur tha ab tirgi mein besh-o-kam milta hai mujhko

ये दिल जो पैकर-ए-सद-नूर था अब तीरगी में बेश-ओ-कम मिलता है मुझ को

یہ دل جو پیکر صد نور تھا اب تیرگی میں بیش و کم ملتا ہے مجھ کو

शायर: Yawar Azeem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये दिल जो पैकर-ए-सद-नूर था अब तीरगी में बेश-ओ-कम मिलता है मुझ को
यही वो डूबता बुझता सितारा है जो अपना हम-क़दम मिलता है मुझ को

कोई लम्हा नहीं आता तरब-ज़ार-एॉतमन्ना में लहकता गुनगुनाता
जिसे आवाज़ देता हूँ वो औरों की तरह माइल-ब-रम मिलता है मुझ को

यूँही घुट घुट के जीने पर मुझे उकसा रहे हैं देखिए हालात मेरे
मैं जितना ग़म से बचना चाहता था दोस्तो उतना ही ग़म मिलता है मुझ को

मुसलसल एक महरूमी का बादल है जो कितने ही घरों पर छा गया है
अब उन आँखों की क़िल्लत हो गई है जिन में सैराबी का नम मिलता है मुझ को

हज़ारों फूल से पैकर म’आशी धूप में कुम्हला गए हैं देख लीजे
मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वहाँ हर शख़्स आतिश-दर-शिकम मिलता है मुझ को

किसी का ख़ुश-तमाज़त लम्स शब ढलते ही लगता है अधूरे ख़्वाब जैसा
'अजब इक सर्द सा मौसम है जो अपने लहू में सुब्ह-दम मिलता है मुझ को

ये लगता है किसी ग़फ़लत-ज़दा लम्हे में मुझ को मार डालेंगे हवादिस
मैं जिन रस्तों में हूँ 'यावर' वहाँ अक्सर हलाकत-ख़ेज़ ख़म मिलता है मुझ को