उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne qatil ko nigun-sar kiya tha maine

अपने क़ातिल को निगूँ-सार किया था मैं ने

اپنے قاتل کو نگوں سار کیا تھا میں نے

शायर: Yawar Azeem11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने क़ातिल को निगूँ-सार किया था मैं ने
कार-नामा ये सर-ए-दार किया था मैं ने

मेरे क़ब्ज़े में किसी शख़्स की तस्वीरें थीं
उस को इक रोज़ ख़बर-दार किया था मैं ने

ज़र्द-रू थी मिरी बाँहों में वो जब आई थी
चूमते चूमते गुलनार किया था मैं ने

बोझ सीने से हटाया था तिरी यादों का
ख़ुद पे एहसान-ए-गिराँ-बार किया था मैं ने

तू अगर झूट समझती है तो फिर झूट सही
सच तो ये है कि तुझे प्यार किया था मैं ने

अब बड़े फ़ख़्र से कहता है मसीहा मेरा
देख दिल को तिरे बीमार किया था मैं ने

यूँ लगा था मिरे जाने की ख़ुशी थी। सब को
घर की दहलीज़ को जब पार किया था मैं ने

वो जो मरियम के तक़द्दुस की अमीं ठहरी थी
आख़िरश उस को हवस-कार किया था मैं ने

सिगरटों से ग़म-ए-हिज्राँ की तवाज़ो' की थी
सारे कमरे को धुआँ-धार किया था मैं ने

मुद्द'ई जितने थे मरने के भगोड़े निकले
हौसला तेग़-ए-सितमगार किया था मैं ने

मैं जहाँ ख़ून में नहलाया गया हूँ 'यावर'
उस गली को कभी गुलज़ार किया था मैं ने