उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye aur baat ki taKHir se alag karunga

ये और बात कि ताख़ीर से अलग करूँगा

یہ اور بات کہ تاخیر سے الگ کروں گا

शायर: Faiz Khalilabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये और बात कि ताख़ीर से अलग करूँगा
मगर तुझे तिरी तस्वीर से अलग करूँगा

मुसाफ़िरत से जो फ़ुर्सत हुई नसीब तो फिर
थकन को पाँव की ज़ंजीर से अलग करूँगा

जो मेरे दाइमी एहसास से जुड़ा है सबक़
मैं किस तरह उसे तहरीर से अलग करूँगा

कुँवारे ख़्वाब हुए जा रहे हैं आवारा
उन्हें मैं लज़्ज़त-ताबीर से अलग करूँगा

उतारना है मुझे अब अना को मौत के घाट
सो उस को लहजा-ए-शमशीर से अलग करूँगा

मिरे बदन में लगी है जो हिज्र की दीमक
मैं उस को वस्ल की तदबीर से अलग करूँगा

रिवायतों से रखूँगा मैं 'फ़ैज़' रिश्ता मगर
सुख़न ज़रा सा तक़ी-'मीर' से अलग करूँगा