उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye aqd-e-dil hai faqat rasm ya zaban ka nahin

ये 'अक़्द-ए-दिल है फ़क़त रस्म या ज़बाँ का नहीं

یہ عقد دل ہے فقط رسم یا زباں کا نہیں

शायर: Ehsan Khan Masood7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये 'अक़्द-ए-दिल है फ़क़त रस्म या ज़बाँ का नहीं
ये वस्ल वक़्त के धागे में इस जहाँ का नहीं

यहाँ अना नहीं चलती यहाँ झुकाव है शर्त
ये साथ ज़िद या अना के किसी निशाँ का नहीं

ये रास्ता है रज़ा-मंद दो दिलों का सफ़र
ये रिश्ता महज़ किसी एक के गुमाँ का नहीं

क़ुबूल-ए-दिल ने सिखाया है 'अक़्द का मतलब
ये साथ चलने का मौक़ा' है इम्तिहाँ का नहीं

ये एक वा'दा है जो ख़ुद को सौंप देने का
ये बोझ लफ़्ज़ का रस्मों के कारवाँ का नहीं

हम अपने दिल को तिरी रूह में बसाएँगे
मक़ाम-ए-दिल तो किसी दूसरे मकाँ का नहीं

ये उस के दिल ने तिरे दिल को घर बनाया है
वगर्ना तो दिल-ए-एहसाँ तू दास्ताँ का नहीं