उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek jahan hai pas-e-mizhgan bhi kahan tak dekhun

इक जहाँ है पस-ए-मिज़्गाँ भी कहाँ तक देखूँ

اک جہاں ہے پس مژگاں بھی کہاں تک دیکھوں

शायर: Ehsan Khan Masood5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक जहाँ है पस-ए-मिज़्गाँ भी कहाँ तक देखूँ
ख़्वाब ही ख़्वाब तिरे हैं मैं जहाँ तक देखूँ

अब तो आँखें मिरी बे-नूर हुई जाती हैं
आने वाले मैं तिरी राह कहाँ तक देखूँ

तू ने महसूस न की मेरे बदन की वहशत
मैं तो इस रूह पे ज़ख़्मों के निशाँ तक देखूँ

एक ख़्वाहिश है कि सूरज की तरह चमकूँ और
जिस जगह है तिरा साया मैं वहाँ तक देखूँ

चाहता हूँ कि तिरे हुस्न को तन्हाई में
खोल कर चश्म-ए-यक़ीं अपने गुमाँ तक देखूँ