उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yahi jo nikla jo uljhanon ka dilon ki koi jawab nikla

यही जो निकला जो उलझनों का दिलों की कोई जवाब निकला

یہی جو نکلا جو الجھنوں کا دلوں کی کوئی جواب نکلا

शायर: Jaleel Qidwai7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यही जो निकला जो उलझनों का दिलों की कोई जवाब निकला
हमारी हस्ती थी इक फ़साना फ़साना जो था सो ख़्वाब निकला

उधर है सर-गर्मी-ए-तग़ाफ़ुल इधर है इक ज़ौक़-ए-सरफ़रोशी
वो हुस्न की एक फ़स्ल निकली ये 'इश्क़ का इक बाब निकला

इक आग सी दिल में लग गई थी धुआँ सा कुछ रह गया था उठ कर
फ़िराक़ की रात दिल का घुट घुट के इस तरह पेच-ओ-ताब निकला

हमारे हक़ में पए-जराहत ये 'इश्क़ के हैं 'अजब करिश्मे
कि दिल तो पहलू से निकला लेकिन न दिल से वो इज़्तिराब निकला

जो राज़-ए-दुनिया से बे-ख़बर है वही हक़ीक़त में बा-ख़बर है
रहा जो इस तजरबे में नाकाम समझो वो कामयाब निकला

हज़ार अफ़सोस दीदा-ए-कोर पर कि इक बार भी न देखा
वो लाख बन बन के चाँद सूरज फ़लक पे गो बे-नक़ाब निकला

सुना है क़ैद-ए-हयात से छुट गया ग़रीब आज शुक्र सद-शुक्र
कशाकश-ए-ग़म से बा'द-ए-मुद्दत 'जलील'-ए-ख़ाना-ख़राब निकला