उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab jo mujhse unhen hijab nahin

अब जो मुझ से उन्हें हिजाब नहीं

اب جو مجھ سے انہیں حجاب نہیں

शायर: Jaleel Qidwai18 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब जो मुझ से उन्हें हिजाब नहीं
दिल को पहला सा इज़्तिराब नहीं

है उन्हें मुझ पे ए'तिमाद-ए-वफ़ा
अब उन्हें मुझ से इज्तिनाब नहीं

बख़्श कर लुत्फ़-ए-वस्ल कहते हैं
अब न कहना कि कामयाब नहीं

इस क़दर हैं वो मेहरबाँ मुझ पर
उन के अल्ताफ़ का हिसाब नहीं

कामयाब-ए-विसाल-ए-जानाँ हूँ
फिर भी कहते हैं कामयाब नहीं

मैं तो सैराब-ए-ऐश-ए-वस्ल करूँ
क्या करूँ तुझ को इस की ताब नहीं

मैं ये क्यूँकर कहूँ कि हस्ब-ए-मुराद
दिल-ए-पुर-शौक़ कामयाब नहीं

आप से छुट के रह नहीं सकता
ब-ख़ुदा इस की दिल को ताब नहीं

अब भी हूँ बे-क़रार-ए-लुत्फ़-ओ-करम
गो वो अगला सा इज़्तिराब नहीं

आप के रहम की ज़रूरत हो
हाल-ए-दिल इस क़दर ख़राब नहीं

वो नज़र लाख बे-हिजाब सही
दस्त-ए-गुस्ताख़ का जवाब नहीं

आज दुनिया-ए-दिल-बरी में कहीं
आप के हुस्न का जवाब नहीं

आज लाखों में इंतिख़ाब हैं आप
दूर दूर आप का जवाब नहीं

रुख़-ए-जानाँ में अब भी है इक बात
गो वो पहली सी आब-ओ-ताब नहीं

आप की चश्म-ए-मस्त के आगे
असर-ए-मस्ती-ए-शराब नहीं

आप के हुस्न के मुक़ाबिल में
कोई शय सुर्ख़ी-ए-गुलाब नहीं

सच तो ये है जमाल-ए-जानाँ का
एक परतव है आफ़्ताब नहीं

आज तेरे सिवा 'जलील' कोई
रंग-ए-हसरत में कामयाब नहीं