उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chashm-e-tar sari raat roti hai

चश्म-ए-तर सारी रात रोती है

چشم تر ساری رات روتی ہے

शायर: Jaleel Qidwai12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चश्म-ए-तर सारी रात रोती है
जब कि दुनिया तमाम सोती है

आज फिर क़ल्ब में है कुछ जुंबिश
गुफ़्तुगू उन से आज होती है

किश्त-ए-ग़म में हमारी चश्म-ए-तर
रोज़-ओ-शब तुख़्म-ए-अश्क बोती है

कट रही है 'अजीब लुत्फ़ से रात
जागती है न आँख सोती है

अश्क अब आँख में नहीं आते
न वो दिल में ख़लिश सी होती है

'अह्द-ए-'इशरत की याद अरे तौबा
दिल में नश्तर सा इक चुभोती है

बाग़ में चाँदनी छिटकती है
आँख बे-इख़्तियार रोती है

तेरे ग़म में जो अश्क-ए-तर टपका
हासिल-ए-बहर-ए-ग़म वो मोती है

किस क़दर बे-क़रार है शबनम
गुल का मुँह आँसुओं से धोती है

चश्म-ए-तर क्यों हुई है दीवानी
किस लिए जान अपनी खोती है

बे-क़रारी हमारी दिल की हैफ़
नाम 'उश्शाक़ का डुबोती है

अश्क-बारी 'अजीब शय है 'जलील'
शीशा-ए-दिल के दाग़ धोती है