उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aai ajib shan se fasl-e-bahaar-e-gul

आई 'अजीब शान से फ़स्ल-ए-बहार-ए-गुल

آئی عجیب شان سے فصل بہار گل

शायर: Jaleel Qidwai9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आई 'अजीब शान से फ़स्ल-ए-बहार-ए-गुल
फूले हैं अपने हुस्न पे क्या क्या निगार-ए-गुल

छेड़ा जो वक़्त-ए-सुब्ह नसीम-ए-बहार ने
निकली हिजाब-ए-गुल से ‘उरूस-ए-बहार-ए-गुल

फिर हो रहा है ताज़ा मज़ाक़-ए-जुनून-ए-'इश्क़
फिर चल रही है मौज-ए-नसीम-ए-बहार-ए-गुल

ना-कामरान-ए-'इश्क़ तसल्ली के वास्ते
जाते हैं फ़र्त-ए-शौक़ में सू-ए-दयार-ए-गुल

अल्लह रे हुस्न-ओ-'इश्क़ की ये कामयाबियाँ
गुल महव-ए-'अंदलीब है बुलबुल निसार-ए-गुल

मुद्दत के ब'अद आन के बैठी जो 'अंदलीब
फ़र्त-ए-ख़ुशी से झूम गई शाख़-सार-ए-गुल

ये आसमान पर हैं सितारे जड़े हुए
या तख़्त-ए-गुल पे है चमन-ए-ज़र-निगार-ए-गुल

जब मेरे सोज़-ए-दिल को तसल्ली न दे सका
फिर क्या करूँ मैं ले के ये जोश-ए-बहार-ए-गुल

नाज़ाँ बहार-ए-गुल पे न हो इस क़दर 'जलील'
क्या ए'तिबार-ए-ख़ंदा-ए-बे-ए'तिबार-ए-गुल