उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhala kya hain barkha ke mausam ke kahne

भला क्या हैं बरखा के मौसम के कहने

بھلا کیا ہیں برکھا کے موسم کے کہنے

शायर: Jaleel Qidwai8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भला क्या हैं बरखा के मौसम के कहने
हसीनों ने पहने हैं फूलों के गहने

न हो उन हसीनों में क्यों जामा-ज़ेबी
लिबास-ए-मोहब्बत जिन्हों ने हों पहने

वफ़ा रंग लाई है मेरी कि मुझ को
वो हैं बेवफ़ाई के देते उलहने

मुक़र्रर था मिलना मिरा उन से लेकिन
मुक़द्दर में थे कुछ दिनों रंज सहने

अजब हाल था दिल की बेताबियों का
न जब तक लगे पास हम दोनों रहने

मिले बा'द मुद्दत तो फ़र्त-ए-ख़ुशी से
लगे चश्म-ए-पुर-शौक़ से अश्क बहने

न दुनिया की मुझ को ख़बर है न दीं की
मिरे दिल पे जादू किया है बिरह ने

'जलील' अब तो वो शोख़ रहता है हर-दम
कभी मेरे बाएँ कभी मेरे दहने