उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yahi guman ghumta hai KHema-e-KHayal mein

यही गुमान घूमता है ख़ेमा-ए-ख़याल में

یہی گمان گھومتا ہے خیمۂ خیال میں

शायर: Yasir Guman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यही गुमान घूमता है ख़ेमा-ए-ख़याल में
निगाह ग़र्क़ हो गई है किस के ख़द्द-ओ-ख़ाल में

मैं हाल अपना दोस्तो तुम्हें सुनाऊँ किस तरह
तड़प तड़प के जी रहा हूँ सिसकियों के जाल में

कि रात की सी तीरगी है सुब्ह की नुमूद में
कि हिज्र की सी लज़्ज़तें हैं अब तिरे विसाल में

न-जाने किस के हाथ से मिला है हम को सुर्ख़ फूल
न-जाने किस का हाथ है हमारे इंतिक़ाल में

उन्हें कभी ख़याल तक नहीं हुआ विसाल का
हमारी 'उम्र कट गई विसाल के ख़याल में

उदासियाँ इसी लिए भी ख़ून में बहुत हैं आज
तिरा मलाल आ गिरा है मेरे दिल के थाल में

तू ढूँढता है किस लिए जवाब इस का दर-ब-दर
तिरा जवाब तो निहाँ है तेरे ही सवाल में