उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mera kaleja mere munh ko aa na jae kahin

मिरा कलेजा मिरे मुँह को आ न जाए कहीं

مرا کلیجہ مرے منہ کو آ نہ جائے کہیں

शायर: Yasir Guman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरा कलेजा मिरे मुँह को आ न जाए कहीं
तुम्हारे जाने का एहसास खा न जाए कहीं

वो देखता है तो बस देखता ही रहता है
वो ना-मुराद मिरे दिल को भा न जाए कहीं

कमाँ सँभाल के रक्खूँ मैं अपने हाथों में
मिरा ही तीर मिरी सम्त आ न जाए कहीं

वो मिल रहा है किसी दूसरे से हँस हँस कर
सो उस का हँसना भी मुझ को रुला न जाए कहीं

मैं उस से बात ही करता नहीं हूँ इस ख़ातिर
वो बात कर के मिरा सर घुमा न जाए कहीं

मुझे ये डर है वो औज़ार-ए-बेवफ़ाई से
मोहब्बतों की 'इमारत गिरा न जाए कहीं