उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab ki kokh mein palte hue ro paDte hain

ख़्वाब की कोख में पलते हुए रो पड़ते हैं

خواب کی کوکھ میں پلتے ہوئے رو پڑتے ہیں

शायर: Yasir Guman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब की कोख में पलते हुए रो पड़ते हैं
नींद में पहलू बदलते हुए रो पड़ते हैं

मुझ से छुप कर मेरे काँधों के फ़रिश्ते अक्सर
घर के आँगन में टहलते हुए रो पड़ते हैं

ऐ परी-ज़ाद तिरी याद में बैठे हम लोग
हाथ को हाथ से मलते हुए रो पड़ते हैं

रोज़ इक याद हमें ज़ख़्म दिया करती है
रोज़ इक याद में जलते हुए रो पड़ते हैं

सुब्ह की गोद के पाले हुए मंज़र अक्सर
हिज्र की रात में ढलते हुए रो पड़ते हैं

देख कर शहर की गलियों के मनाज़िर ख़ूनीं
शहर-ए-आशोब में चलते हुए रो पड़ते हैं

इतने मानूस हैं हम कूचा-ए-जानाँ से 'गुमान'
हम तिरे घर से निकलते हुए रो पड़ते हैं