उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is liye lagta hai mujhko Dar dar-o-diwar se

इस लिए लगता है मुझ को डर दर-ओ-दीवार से

اس لیے لگتا ہے مجھ کو ڈر در و دیوار سے

शायर: Yasir Guman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस लिए लगता है मुझ को डर दर-ओ-दीवार से
मुझ पे हँसता है कोई शब भर दर-ओ-दीवार से

तेरे बिन मैं ख़ाक हूँ और मेरे बिन तू ख़ाक है
घर से हैं दीवार-ओ-दर और घर दर-ओ-दीवार से

घर पे हल्ला बोलता है शाम हो जाने के बा'द
इक पुरानी याद का लश्कर दर-ओ-दीवार से

किस तरह का शहर है ये किस तरह के लोग हैं
फेंकता है हर कोई पत्थर दर-ओ-दीवार से

यूँ दिल अपना खोल कर तू 'इश्क़ की बातें न कर
घर किसी अंजान का है डर दर-ओ-दीवार से

बैठ जाता हूँ किसी कोने में छुप कर इस लिए
ख़ौफ़ आता है मुझे अक्सर दर-ओ-दीवार से

ख़्वाब ने ये चीख़ कर मुझ से कहा 'यासिर-गुमान’
झाँक कर देखा भी कर बाहर दर-ओ-दीवार से