उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badan ke dasht mein kuchh dard ke aahu nikalte hain

बदन के दश्त में कुछ दर्द के आहू निकलते हैं

بدن کے دشت میں کچھ درد کے آہو نکلتے ہیں

शायर: Yasir Guman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदन के दश्त में कुछ दर्द के आहू निकलते हैं
मिरी ग़ज़लों में इस ख़ातिर नए पहलू निकलते हैं

मैं हैराँ हूँ कि मुझ को तुम मिली हो किन सवाबों से
गुनहगारों की क़ब्रों में तो बस बिच्छू निकलते हैं

बहुत लाचार होते हैं दयार-ए-'इश्क़ में वो भी
जो दुनियावी रवाबित में बड़े बाबू निकलते हैं

नज़र पड़ती है जब मेरी तिरी छोड़ी निशानी पर
मिरी आँखों से आँसू हो के बे-क़ाबू निकलते हैं

मिरा दिल है पुराने दौर की तीरा-शबी का घर
तिरी यादों के चमगादड़ यहाँ हर-सू निकलते हैं

हमी को देख कर आँखों से वो पर्दा उठाता है
हमारे क़त्ल को हर सम्त से चाक़ू निकलते हैं