उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yahan kisi ko bhi kuchh hasb-e-arzu na mila

यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला

یہاں کسی کو بھی کچھ حسب آرزو نہ ملا

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला

ग़ज़ाल-ए-अश्क सर-ए-सुब्ह दूब-ए-मिज़्गाँ पर
कब आँख अपनी खुली और लहू लहू न मिला

चमकते चाँद भी थे शहर-ए-शब के ऐवाँ में
निगार-ए-ग़म सा मगर कोई शम्अ-रू न मिला

उन्ही की रम्ज़ चली है गली गली में यहाँ
जिन्हें उधर से कभी इज़्न-ए-गुफ़्तुगू न मिला

फिर आज मय-कदा-ए-दिल से लौट आए हैं
फिर आज हम को ठिकाने का हम-सबू न मिला