उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo sabr tha to sabr ka phal hona chahiye

वो सब्र था तो सब्र का फल होना चाहिए

وہ صبر تھا تو صبر کا پھل ہونا چاہیے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो सब्र था तो सब्र का फल होना चाहिए
ये मसअला है और इसे हल होना चाहिए

ये फ़िक्र है तो इस को कोई शक्ल हो 'अता
तज्वीज़ है तो इस पे 'अमल होना चाहिए

तफ़्सील-ए-वस्ल आप ने तय की तो है मगर
थोड़ा सा इस में रद्द-ओ-बदल होना चाहिए

मुमकिन है जितना आज ही कर डालिए न क्यों
जो काम बच रहे उसे कल होना चाहिए

गिरता है वज़्न भी तो गिरे कुछ ज़ियाँ नहीं
मक़्सद है ये कि मास असल होना चाहिए

कहते हैं रोना-पीटना ही इस में हो फ़क़त
या'नी ग़ज़ल को सिर्फ़ ग़ज़ल होना चाहिए

गिरगिट की तरह रंग बदलना ये रोज़ रोज़
है फ़ैसला तो इस को अटल होना चाहिए

गंदुम न हो तो भुस भी ग़नीमत है ऐ 'ज़फ़र'
गर वो नहीं तो उस का बदल होना चाहिए