उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo qarib bhi hain to kya hua hamein apne kaam se kaam hai

वो क़रीब भी हैं तो क्या हुआ हमें अपने काम से काम है

وہ قریب بھی ہیں تو کیا ہوا ہمیں اپنے کام سے کام ہے

शायर: Kaif Moradaabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो क़रीब भी हैं तो क्या हुआ हमें अपने काम से काम है
वही जुस्तुजू वही बे-ख़ुदी वही ज़िंदगी का निज़ाम है

तलब इर्तिक़ा की असास है कि ग़म-ए-असीरी का नाम है
कि जहाँ चमन है वहीं क़फ़स जहाँ दाना है वहीं दाम है

हमा-वक़्त मुझ को यही है ग़म कि उन्हें है मेरा ख़याल कम
मगर इस की फ़िक्र कभी नहीं कि मिरा जुनूँ भी तो ख़ाम है

मुझे मय-कदे में किसी ने कल ये बताया मस्लक-ए-आशिक़ी
जिसे बादा वज्ह-ए-सुरूर हो उसे बादा पीना हराम है

ये है शान-ए-महफ़िल-ए-आशिक़ी कि तवील अर्सा गुज़र के भी
वही बुत-कदे की सी सुब्ह है वही मय-कदे की सी शाम है

ये है कैसा आलम-ए-बे-ख़ुदी नहीं होश उन की रज़ा का भी
जो यही है 'कैफ़' जुनून-ए-ग़म तो जुनून-ए-ग़म को सलाम है