उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo qafile mein to kya tha ghubar mein bhi na tha

वो क़ाफ़िले में तो क्या था ग़ुबार में भी न था

وہ قافلے میں تو کیا تھا غبار میں بھی نہ تھا

शायर: Usama Zoraiz4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो क़ाफ़िले में तो क्या था ग़ुबार में भी न था
जो अव्वल आया है पहले हज़ार में भी न था

तिरे न आने का सुन के बहुत उदास हुआ
वो आदमी जो तिरे इंतिज़ार में भी न था

तमाम सम्तें सभी रास्ते उसी के थे
मिरा बचाव तो राह-ए-फ़रार में भी न था

भुगत रहा हूँ उसी की सज़ा अभी 'ज़ोरेज़'
वो फ़ैसला जो मिरे इख़्तियार में भी न था