उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo KHush-jamal na ho chehra aaftab na ho

वो ख़ुश-जमाल न हो चेहरा आफ़्ताब न हो

وہ خوش جمال نہ ہو چہرہ آفتاب نہ ہو

शायर: Ghalib Duraib10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ख़ुश-जमाल न हो चेहरा आफ़्ताब न हो
मगर किसी में उसे देखने की ताब न हो

अगरचे उस का इरादा हो कामयाबी का
मगर वो अपने इरादे में कामयाब न हो

न हों शुमार दिए जाएँ इतने ज़ख़्म हमें
सितम हो इतना कि जिस का कोई हिसाब न हो

निचोड़ता रहूँ तुझ लब से मैं शराब-ए-हयात
सो कर दु'आ कि तिरा ज़ाइक़ा ख़राब न हो

वो ख़ुश-बदन कि तमन्ना हो जिस को छूने की
ख़ुदा करे कि कभी तुझ को दस्तयाब न हो

कि काटनी ही न पड़ जाए 'उम्र भर की सज़ा
किसी से जुर्म-ए-मोहब्बत का इर्तिकाब न हो

बचो जो तुम को निगल जाए ऐसी ख़ल्वत से
और ऐसी बज़्म से जिस में कोई शराब न हो

हसीन भी हो ज़ेहानत भी ख़ूब हो लेकिन
तमाम 'उम्र किसी का वो इंतिख़ाब न हो

वो शख़्स जिस को मोहब्बत नहीं हुई हो कभी
और एक बाग़ कि जिस में कोई गुलाब न हो

मुझे सफ़र की इजाज़त तो मिल गई है 'दुरैब'
मगर ये डर है कि अब रास्ता ख़राब न हो