उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri mohabbaton ka tir us pe chal nahin raha

मिरी मोहब्बतों का तीर उस पे चल नहीं रहा

مری محبتوں کا تیر اس پہ چل نہیں رہا

शायर: Ghalib Duraib9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरी मोहब्बतों का तीर उस पे चल नहीं रहा
जला रहा हूँ मैं मगर चराग़ जल नहीं रहा

ये और सानिहा है जो मलूल हो रहा हूँ मैं
तुम्हारे छोड़ जाने पर मैं हाथ मल नहीं रहा

निकल के आ गया हूँ तेरे शहर-ए-ना-मुराद से
मगर तिरा ख़याल ज़ेहन से निकल नहीं रहा

कि उस की याद पहले भी तो रोज़ आती थी मुझे
न जाने आज क्यों मगर ये दिल सँभल नहीं रहा

मिलेगा आज शाम वो किया है वा'दा उस ने और
सितम ये देखिए कि आफ़्ताब ढल नहीं रहा

वो आँखें बुझ गई हैं अब वो होंट ख़ुश्क हो गए
मिरी उदासियों का अब कोई भी हल नहीं रहा

कि सूक़-ए-चश्म में मियाँ वो रौनक़ें नहीं रहीं
कि मुद्दतें हुईं यहाँ पे काम चल नहीं रहा

सो उस पे क्या ग़ज़ल लिखें वो हुस्न अब तो ढल गया
सो उस शजर पे बात क्या वो जिस पे फल नहीं रहा

हज़ार हरबे आज़माए उस के वास्ते 'दुरैब'
ख़याल हैफ़ कोई भी मगर सफल नहीं रहा