उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko darkar nahin aaj ya kal ki lazzat

मुझ को दरकार नहीं आज या कल की लज़्ज़त

مجھ کو درکار نہیں آج یا کل کی لذت

शायर: Ghalib Duraib6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को दरकार नहीं आज या कल की लज़्ज़त
ऐसा फल चाहिए हो जिस में अज़ल की लज़्ज़त

नर्म हाथों से मुझे छू के गुज़रती हुई वो
हाए होती हुई महसूस ये हल्की लज़्ज़त

हाथ आई है कई बार तिरी शाख़-ए-बदन
मैं कई बार चखा हूँ तिरे फल की लज़्ज़त

हो गई ख़त्म मगर दाद न देना छोड़ो
अभी महसूस किए जाओ ग़ज़ल की लज़्ज़त

सब नहीं कहते हैं इस बहर में ग़ज़लें साहिब
सब नहीं जानते हैं बहर-ए-रमल की लज़्ज़त

क्या ज़रूरत है वो ता-'उम्र मयस्सर हो 'दुरैब'
भूल पाऊँगा नहीं एक ही पल की लज़्ज़त