उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab tamasha raha hai hamare hone ka

अजब तमाशा रहा है हमारे होने का

عجب تماشہ رہا ہے ہمارے ہونے کا

शायर: Ghalib Duraib7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजब तमाशा रहा है हमारे होने का
कि ख़ूब रोने का पलकें नहीं भिगोने का

मिले हैं दर्द फ़क़त ये नहीं है काफ़ी हमें
हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का

तुम्हारे पाने पे कोई ख़ुशी हुई तो नहीं
मगर जो रंज हुआ है तुम्हारे खोने का

तमाम रात यही सोचना कि सो जाएँ
तमाम रात मगर नींद से न सोने का

उसे न छूना जो 'औरत तुम्हें नहीं चाहे
ज़मीन बाँझ नहीं हो तो बीज बोने का

ये सच है मुझ को मोहब्बत थी उस चुड़ैल से और
नहीं था मुझ पे असर उस के जादू टोने का

लिया है 'उम्र-ए-रवाँ से यही सबक़ हम ने
'दुरैब' बोझ अगर अपना हो तो ढोने का