उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo kam-amez mujhse ham-suKHan hone laga hai

वो कम-आमेज़ मुझ से हम-सुख़न होने लगा है

وہ کم آمیز مجھ سے ہم سخن ہونے لگا ہے

शायर: Tabassum Anwar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो कम-आमेज़ मुझ से हम-सुख़न होने लगा है
ब-यक लहज़ा ये दश्त-ए-दिल चमन होने लगा है

सुहूलत से वो पढ़ता जा रहा है ज़ेहन मेरा
बदन सोचों का फिर बे-पैरहन होने लगा है

मिरी तन्हाई और वहशत में फिर से ठन गई है
यूँ लगता है कोई घमसान रन होने लगा है

अता कीजे मिरे मुर्शिद मुझे कोई वज़ीफ़ा
मिरा दिल फिर से दुनिया में मगन होने लगा है

ये रूहों के मिलन की कर न दे मसदूद राहें
कि हाइल इस मिलन में अब बदन होने लगा है

पकड़ ही ली जड़ें उल्फ़त ने आख़िर इस ज़मीं में
दयार-ए-ग़ैर अब मेरा वतन होने लगा है

बिठा रक्खे हैं उस ने मुझ पे यूँ नादीदा पहरे
खुला माहौल भी मन की घुटन होने लगा है

मिरे तर्ज़-ए-तकल्लुम में था जो बे-साख़्ता-पन
वही मेरे सुख़न का बाँकपन होने लगा है

जहाँ त्यागा 'तबस्सुम' जिस को अपनाने की ख़ातिर
उसी से अब बिछड़ने का जतन होने लगा है