उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na roab-e-jah mein aa kar kisi se guftugu ki

न रो'ब-ए-जाह में आ कर किसी से गुफ़्तुगू की

نہ رعب جاہ میں آ کر کسی سے گفتگو کی

शायर: Tabassum Anwar11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न रो'ब-ए-जाह में आ कर किसी से गुफ़्तुगू की
जो हम ने की तो फिर अपनी ख़ुशी से गुफ़्तुगू की

ज़रूरी हो गया था शहर-ए-दिल बर्बाद करना
सो कर के हौसला ग़ारत-गरी से गुफ़्तुगू की

अदब की महफ़िलें खींचें हैं दिल लेकिन वहाँ तो
सभी थे बे-अदब सो बे-दिली से गुफ़्तुगू की

फ़साने बे-क़रारी के सुनाती और किस को
ये तेरा ग़म था तेरे हिज्र ही से गुफ़्तुगू की

अमीर-ए-सल्तनत था शाइबा तक हो न पाया
कि उस ने यूँ कमाल-ए-आजिज़ी से गुफ़्तुगू की

क़ज़ा से माँग के मोहलत फिर हम ने पल-दो-पल की
ये पहली बार था जब ज़िंदगी से गुफ़्तुगू की

मैं लहजे के फ़ुसूँ में गुम थी सो ये तक न समझी
क्यों उस ने अब के इस वारफ़्तगी से गुफ़्तुगू की

न रास आईं जो हम को महफ़िलें शोर-ओ-शग़ब की
तो कुंज-ए-गुल में जा कर ख़ामुशी से गुफ़्तुगू की

दिखाई तूर पर मैं ने कुछ ऐसे होशियारी
कि आँखें बंद कर के रौशनी से गुफ़्तुगू की

रक़म इक दास्तान-ए-सब्र होने को थी लेकिन
समुंदर ने ख़ुद आ कर तिश्नगी से गुफ़्तुगू की

'तबस्सुम' कुछ भरम रखतीं त'आरुफ़ होने देतीं
यूँ बे-ख़ुद हो के क्यों उस अजनबी से गुफ़्तुगू की