उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhse milne mere KHeme mein chali aati hai gard

मुझ से मिलने मेरे खे़मे में चली आती है गर्द

مجھ سے ملنے میرے خیمے میں چلی آتی ہے گرد

शायर: Tabassum Anwar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ से मिलने मेरे खे़मे में चली आती है गर्द
दश्त-ए-वहशत में फ़क़त मेरी मुलाक़ाती है गर्द

दश्त में बसना मुझे इस वास्ते रास आ गया
गर्द से मिल कर मिरी हस्ती भी बन जाती है गर्द

राएगानी का सताता है मुझे एहसास जब
ज़िंदगी का सोचती हूँ याद आ जाती है गर्द

फिर कोई वहशत घुमाए दायरा-दर-दायरा
घेर कर जब भी मुझे सहरा में ले जाती है गर्द

आइना यादों का अब खोने लगा है आब-ओ-ताब
कुछ तो खाए ज़ंग उस को और कुछ खाती है गर्द

दूरी-ए-मंज़िल हो कम जब ख़ार-ओ-ख़स उठने लगें
कारवाँ के कूच का उन्वान बन जाती है गर्द

जो अकड़ कर चल रहा है एक फ़िरऔं की तरह
ऐसे इंसाँ को इशारा इक मुकाफ़ाती है गर्द

सारा दिन हम सात भटकें शाम को थक हार कर
साथ मेरे हीर वारिस-शाह की गाती है गर्द

बस इसी ख़ातिर 'तबस्सुम' मुझ को ये भाती नहीं
आप की तस्वीर पर रोज़ाना पड़ जाती है गर्द