उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo jo tumne gham diya tha mujhe sazgar hota

वो जो तुम ने ग़म दिया था मुझे साज़गार होता

وہ جو تم نے غم دیا تھا مجھے سازگار ہوتا

शायर: Panna Lal Noor8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो जो तुम ने ग़म दिया था मुझे साज़गार होता
अगर इतना और होता कि वो उस्तुवार होता

तिरी बे-रुख़ी के सदक़े मुझे आ गया है जीना
न तो रूठता न ज़ालिम मुझे ग़म से प्यार होता

शब-ओ-रोज़ के नज़ारे ये करिश्मे रंग-ओ-बू के
ये तिलिस्म तोड़ देता अगर इख़्तियार होता

उसे वक़्फ़-ए-ख़ाक कर के किया ख़ूब तू ने वर्ना
ये वो ज़र्रा था कि उठता तो फ़लक पे बार होता

कभी एक बार भी तो मिरा तज़्किरा चमन में
ब-ज़बान-ए-गुल न होता ब-ज़बान-ए-ख़ार होता

लो सुनो कि अब ज़माना तुम्हें कह रहा है क्या कुछ
यही मैं जो अर्ज़ करता तुम्हें नागवार होता

मिरे पास-ए-ज़ब्त-ए-ग़म को न हुआ पसंद वर्ना
न मुझे क़रार होता न तुम्हें क़रार होता

अरे 'नूर' कौन सुनता तिरा उज़्र-ए-बे-गुनाही
तू गुनाह भी न करता तो गुनाहगार होता