उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo is ada se wahan ja ke sharmsar aaya

वो इस अदा से वहाँ जा के शर्मसार आया

وہ اس ادا سے وہاں جا کے شرمسار آیا

शायर: Dagh Dehlvi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो इस अदा से वहाँ जा के शर्मसार आया
रक़ीब पर मुझे बे-इख़्तियार प्यार आया

ये हाल था शब-ए-वा'दा कि ता-ब-राहगुज़र
हज़ार बार गया मैं हज़ार बार आया

तिरा ही कूचा ठिकाना है ख़ाकसारों का
जो ज़िंदा आ न सका मैं मिरा ग़ुबार आया

मज़े उड़ाए वहाँ ख़ुश रहा लिया इनआ'म
यहाँ जो नामा-बर आया तो अश्क-बार आया

गुज़र गए इसी गर्दिश में अपने लैल-ओ-नहार
शब-ए-फ़िराक़ गई रोज़-ए-इंतिज़ार आया

उड़ाए हैं मलक-उल-मौत ने भी तेरे ढंग
हज़ार बार बुलाया तो एक बार आया

ख़ुदा के वास्ते झूटी न खाइए क़स्में
मुझे यक़ीन हुआ मुझ को ए'तिबार आया

कहाँ थे शब को तुम्हें कुछ ख़बर भी है कि नहीं
कोई पुकारने वाला बहुत पुकार आया

कमाल-ए-इश्क़ को फ़रहाद-ओ-क़ैस कब पहुँचे
वो पुख़्ता-कार है दिल जिस का बार बार आया

वो क्यों हुए मिरे मुश्ताक़ ख़ैर हो या-रब
तलब में कल ही ख़त आया था आज तार आया

पिला दे आज सर-ए-शाम मुझ को ऐ साक़ी
कि तेरी बज़्म में इक मैं ही रोज़ा-दार आया

डरे जो हश्र में वो मुझ को देखते ही कहा
मिरा रफ़ीक़ मिरा 'दाग़'-ए-जाँ-निसार आया