उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo gul wo KHwab-shaar bhi nahin raha

वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा

وہ گل وہ خوابشار بھی نہیں رہا

शायर: Idris Babar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा
सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा

ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है
जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा

पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद
किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा

ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त
कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा

ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और
मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा